Wednesday, August 12, 2026

सबसे मुश्किल जाँच वो होती है, जहाँ आपका दिल पागलों की तरह यह दुआ कर रहा हो कि मुजरिम बेकसूर निकले। नवंबर की उस उदास और खामोश दोपहर में, शर्मा निवास के बेडरूम का तापमान अचानक शून्य से भी नीचे गिर गया था. कमरे में हीटर नहीं था, खिडकियाँ बंद थीं, और बाहर की गुनगुनी धूप परदों से छनकर बिस्तर पर गिर रही थी, लेकिन सावी का पूरा शरीर किसी बर्फीले तूफान के बीच खडे होने जैसा काँप रहा था. उसके कानों में एक अजीब सी, बहरी कर देने वाली भिनभिनाहट थी. यह आवाज किसी मशीन की नहीं थी, बल्कि उसके अपने ही दिमाग के पुर्जों के आपस में टकराने और टूटने की आवाज थी. बिस्तर पर, उस भारी, खाकी रंग के' जेड- डेल्टा- नाइन' वाले सरकारी लिफाफे के ठीक बगल में, वो पानी से गला हुआ, मटमैला कागज का टुकडा पडा था. और सावी की आँखें उस टुकडे पर इस कदर गडी थीं, जैसे वो कोई कागज नहीं, बल्कि कोई ऐसा जहरीला साँप हो जो फन काढे बैठा हो और किसी भी पल उसे डस लेगा. जो रास्ते दिखाई देते हैं, मंजिल अक्सर उनसे दूर होती है। पेरिस की उस खूनी सर्विस लेन में कूरियर की कार के टायरों के पास मिला वो कागज. और दूसरी तरफ, उसके दिमाग में गूँजती हुई कल शाम की वो आवाज. मनीष की आवाज. वही ठहराव, वही गहराई, वही अंदाज. जब वो ड्राइंग Room की दरी पर बैठकर रिया को स्कूल का होमवर्क करवा रहा था. जो लफ्ज कागज पर मौन हैं, असली शोर उन्हीं की खामोशी में पलता है। सावी ने अपने दोनों हाथों से अपने सिर को कसकर पकड लिया. वो इस सोच को अपने दिमाग से बाहर निकाल फेंकना चाहती थी. वो चाहती थी कि कोई उसके दिमाग की नसों को खींच दे, उसकी याददाश्त मिटा दे, ताकि उसे इन दोनों वाक्यों के बीच का वो खौफनाक, अदृश्य धागा दिखाई न दे. नहीं. सावी के सूखे हुए होंठों से एक बहुत ही बेबस, फुसफुसाती हुई आवाज निकली. ऐसा नहीं हो सकता. यह सिर्फ एक इत्तेफाक है. एक बहुत ही भद्दा, भयानक इत्तेफाक। लेकिन' इत्तेफाक' या' संयोग' खुफिया दुनिया का सबसे बडा झूठ है. एक जासूस को अपनी Training के पहले दिन ही यह सिखाया जाता है कि दुनिया में संयोग नाम की कोई चीज नहीं होती. अगर दो चीजें एक जैसी दिखती हैं, तो उनके पीछे कोई न कोई पैटर्न जरूर होता है. सावी का दिल चीख- चीख कर कह रहा था कि यह संयोग है, लेकिन उसका प्रशिक्षित दिमाग अब पूरी तरह से बगावत पर उतर आया था. एजेंट छोटी इलायची' जाग चुकी थी, और इस बार उसका शक किसी अजनबी पर नहीं, बल्कि उसी इंसान पर था जिसके नाम का सिंदूर वो अपनी माँग में सजाती थी. सावी झटके से बिस्तर से उठी. उसकी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं. वो लगभग दौडती हुई ड्राइंग Room में गई. वहाँ टेबल पर रिया की किताबें और कॉपियाँ अभी भी सलीके से रखी हुई थीं. सावी ने काँपते हाथों से रिया की वो हिंदी की कॉपी ढूँढी जिसमें उसने कल रात का होमवर्क किया था. कॉपी मिल गई. सावी ने उसे सीने से लगाया और वापस अपने बेडरूम में आकर दरवाजा अंदर से लॉक कर लिया. उसने रिया की वो कॉपी बिस्तर पर खोली. नीले पेन से, बच्चों वाली गोल मटोल लिखाई में वो लाइन लिखी हुई थी जो मनीष ने उसे बोलकर लिखवाई थी. सावी ने पेरिस वाले उस मटमैले कागज को उठाया और रिया की कॉपी के ठीक बगल में रख दिया. अब दोनों वाक्य आमने- सामने थे. सावी ने एक गहरी साँस ली और एक जासूस की तरह उन दोनों वाक्यों का' फॉरेंसिक विश्लेषण' शुरू किया. उसने सबसे पहले लिखावट देखी. पेरिस वाले कागज पर जो लिखावट थी, वो बहुत ही तेज, नुकीली और कोणीय थी. ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने बहुत जल्दबाजी में, लेकिन बेहद आत्मविश्वास के साथ उन शब्दों को कागज पर उकेरा हो. स्याही काले रंग की थी और शब्दों के बीच की दूरी बहुत ही सटीक थी, जो अक्सर यूरोपीय या पश्चिमी देशों में पढे- लिखे लोगों की लिखावट में पाई जाती है. और मनीष की लिखावट? सावी को मनीष की लिखावट बहुत अच्छी तरह याद थी. वो हमेशा नीले या हरे रंग के पेन का इस्तेमाल करता था. उसके अक्षर गोल होते थे, थोडे फैले हुए, जैसे कोई पुराना सरकारी बाबू फाइलें लिखता हो. उसमें कोई नुकीलापन नहीं था, कोई हडबडी नहीं थी. सावी के सीने में जो एक भारी पत्थर रखा था, वो अचानक थोडा हल्का हो गया. उसने एक लंबी राहत की साँस छोडी. लिखावट बिल्कुल अलग है, सावी ने खुद से कहा. उसके होठों पर एक बहुत ही दयनीय, लेकिन उम्मीद से भरी मुस्कान आ गई. शब्द भी बिल्कुल अलग हैं. एक में रास्ते और मंजिल का जिक्र है, दूसरे में लफ्ज और खामोशी का. मैं भी कितनी पागल हूँ. मैं खामखाँ बातों का बतंगड बना रही हूँ. कहाँ पेरिस का वो खतरनाक कूरियर, और कहाँ मेरा सीधा- साधा मनीष। उसने उस कागज को हटाने के लिए हाथ बढाया. वो इस बेतुकी जाँच को यहीं खत्म कर देना चाहती थी. लेकिन तभी. उसके दिमाग के उस अचेतन, जासूसी हिस्से ने एक ऐसा सवाल उठाया जिसने उसकी उस राहत की साँस को गले में ही जमा दिया. लिखावट अलग है. शब्द अलग हैं. लेकिन क्या इनकी रूह अलग है? सावी का हाथ हवा में ही रुक गया. उसने उन दोनों वाक्यों को फिर से पढा. इस बार शब्दों की तरह नहीं, बल्कि एक' सिफर' की तरह. खूफिया तंत्र में, विशेषकर उन एजेंसियों में जो बहुत ही पुराने और गहरे स्तर पर काम करती हैं, डिजिटल एन्क्रिप्शन से ज्यादा' साहित्यिक कूटलेखन' पर भरोसा किया जाता है. कंप्यूटर हैक हो सकते हैं, लेकिन इंसानी दिमाग की लय हैक नहीं हो सकती. सावी ने दोनों वाक्यों के' व्याकरण' और' मीटर' को अपने दिमाग में गिनना शुरू किया. वाक्य एक: जो रास्ते दिखाई देते हैं, मंजिल अक्सर उनसे दूर होती है। वाक्य दो: जो लफ्ज कागज पर मौन हैं, असली शोर उन्हीं की खामोशी में पलता है। दोनो वाक्यों की शुरुआत एक' विरोधाभास' से होती है. जो दिखता है, वो है नहीं. जो मौन है, वो शोर है. दोनों वाक्यों को बोलते समय बीच में एक बहुत ही सटीक, अस्वाभाविक सा ठहराव आता है. दोनों वाक्यों में अक्षरों का उतार- चढाव एक बहुत ही पुरानी, सूफी या क्लासिकल शायरी की तरह है, जिसे आज की बोलचाल की भाषा में इस्तेमाल नहीं किया जाता. यह एक' कॉल एंड रिस्पांस' प्रोटोकॉल था. अगर कोई एक एजेंट किसी भीड- भाड वाले इलाके में या किसी संचार माध्यम पर पहला वाक्य बोलेगा, तो दूसरा एजेंट उसे पहचानने के लिए उसी' लय' में दूसरा वाक्य बोलेगा. उन्हें एक ही शब्द बोलने की जरूरत नहीं है, उन्हें सिर्फ उस' काव्यात्मक साँचे' को फॉलो करना है. इससे दुनिया को लगेगा कि दो लोग बस किसी कविता या शायरी की बात कर रहे हैं, लेकिन असल में वे एक- दूसरे की पहचान प्रमाणित कर रहे होंगे. सावी का सिर चकराने लगा. अगर मनीष ने सिर्फ इत्तेफाक से कोई लाइन बोली होती, तो उसकी लय पेरिस के उस कूरियर के' डेड ड्रॉप' नोट से इतनी खौफनाक हद तक मेल कैसे खा सकती थी? क्या मनीष को यह' साँचा' पता था? क्या उसे इसी भाषा में बात करने की Training दी गई थी? नहीं! नहीं! नहीं! सावी अपने बिस्तर से उठ खडी हुई. वो पीछे हटती गई जब तक कि उसकी पीठ ठंडी दीवार से नहीं टकरा गई. सावी का दिमाग चिल्ला- चिल्ला कर सबूत पेश कर रहा था, लेकिन उसका दिल पूरी ताकत से बगावत कर रहा था. यह एक ऐसी जंग थी जहाँ जीतने वाला भी सब कुछ हारने वाला था. मैं पागल हो रही हूँ, सावी ने अपने बालों को मुट्ठी में भींचते हुए कहा. यह पीटीएसडी (PTSD) है. यह पेरिस का सदमा है. मैं अपने ही घर को, अपने ही प्यार को अपनी इस दिमागी बीमारी से तबाह कर रही हूँ। उसने आँखें बंद कीं और मनीष की उन यादों को ढूँढने लगी जो उसकी बेगुनाही साबित कर सकें. उसे याद आया कि कैसे मनीष को छिपकलियों से डर लगता था. एक बार घर में छिपकली आ गई थी, तो वो सोफे के ऊपर चढकर खडा हो गया था और तब तक नहीं उतरा जब तक सावी ने उसे भगा नहीं दिया. क्या एक हाई- लेवल अंडरकवर एजेंट छिपकली से डरेगा? उसे याद आया कल रात का वो नजारा. मनीष ने आटा गूँथते वक्त अपना पूरा हाथ चिपका लिया था. उसने रोटियाँ जला दी थीं. वो अपनी ही बेटी के होमवर्क से परेशान हो गया था. क्या दुनिया की कोई भी खुफिया एजेंसी इतने अनाडी इंसान को अपना एजेंट बनाएगी? मनीष मेरा है. वो कोई जासूस नहीं है. वो बस एक क्लर्क है, जिसे शायरी का शौक है. उसने कोई गजल पढी होगी, कोई किताब पढी होगी, और उसी की कोई लाइन उसके दिमाग में रह गई होगी. यह एक संयोग है. दुनिया में आठ सौ करोड लोग हैं, दो लोगों के ख्यालों की लय एक जैसी हो सकती है. इसमें कुछ भी खौफनाक नहीं है! सावी अपने आप को ये दलीलें दे रही थी. वो खुद को मनाने की कोशिश कर रही थी. वो इस शक की आग पर अपनी यादों का पानी डाल रही थी. तभी दिमाग के उस अंधेरे कोने से एक और विचार साँप की तरह रेंगता हुआ बाहर आया. सावी, क्या तुम्हारे पडोसियों को पता है कि तुम कौन हो? क्या कुसुम या विमला ताई को पता है कि तुमने पेरिस में कितने लोगों की जान ली है? तुम भी तो रोटियाँ बेलती हो. तुम भी तो सब्जी वाले से दस रुपये के लिए लडती हो. तुम भी तो करवा चौथ का व्रत रखती हो. अगर दुनिया की सबसे बेहतरीन जासूस एक साधारण हाउसवाइफ का रूप ले सकती है. तो क्या एक दूसरा जासूस एक' अनाडी, कविताएं लिखने वाले सीधे- सादे पति' का रूप नहीं ले सकता? छिपकली से डरना, रोटियाँ जलाना. क्या ये सब एक बहुत ही बारीकी से डिजाइन किया गया' कवर लीजेंड' नहीं हो सकता? चुप रहो! सावी ने जोर से फुसफुसाते हुए अपने ही दिमाग को डाँटा. उसके आँखों से आँसू बहने लगे. वो इस सच्चाई का सामना नहीं कर सकती थी. अगर मनीष निर्दोष नहीं था, अगर वो भी उसी दलदल का हिस्सा था जिससे सावी लड रही थी, तो सावी की पूरी जिंदगी एक झूठ थी. उसका प्यार, उसकी शादी, उसके बच्चे. सब एक साजिश की बुनियाद पर खडे थे. मैं ज्यादा सोच रही हूँ, सावी ने अपने आँसू पोंछे. मैं एक बहुत ही बीमार, शक्की और खराब इंसान बन गई हूँ. मनीष ने मुझे इतना प्यार दिया, और मैं उसे सिर्फ एक कागज के टुकडे पर तौल रही हूँ. मुझे इसे खत्म करना होगा. मुझे इस शक को जड से मिटाना होगा। सावी ने दीवार का सहारा छोडा और तेज कदमों से बिस्तर की तरफ आई. उसने तय कर लिया था कि वो इस कागज को, इस सुराग को, और अपने इस भयानक शक को हमेशा के लिए जला देगी. वो अपनी शादी को इस जासूसी वहम की भेंट नहीं चढने देगी. उसने पेरिस वाला वो मटमैला कागज उठाया. लेकिन जैसे ही उसने उसे फाडने के लिए अपने हाथ बढाए, उसकी उंगलियाँ काँपने लगीं. एक जासूस कभी भी सबूत नष्ट नहीं करता. चाहे वो सबूत उसके अपने ही दिल के टुकडे क्यों न कर दे. उसे पेरिस में मारा गया रिषि याद आ गया. उसे राणा sir का वो खून से सना हुआ पेट याद आ गया. अगर यह कागज उस बहुत बडी साजिश की एक छोटी सी कडी है, अगर यह कागज उन हत्यारों तक पहुँचने का इकलौता रास्ता है, तो क्या वो सिर्फ अपने पति को बचाने के लिए, अपनी मानसिक शांति के लिए, इसे जला सकती है? सावी का दिल चीख रहा था कि इसे फाड दो, इसे जला दो. लेकिन उसकी रूह, जो इस देश की हिफाजत की कसमें खा चुकी थी, वो उसे ऐसा करने से रोक रही थी. सावी ने एक बीच का रास्ता निकाला. एक ऐसा रास्ता जो उसके दिल और दिमाग दोनों को कुछ देर के लिए शांत कर दे. उसने अपना फोन उठाया. उसने कैमरा ऑन किया और उस मटमैले कागज की बहुत ही साफ, हाई- रेजोल्यूशन तस्वीर खींच ली. फिर वो कमरे के कोने में रखे छोटे से स्टडी टेबल की तरफ गई, जहाँ बच्चों के स्कूल प्रोजेक्ट्स के लिए एक छोटा सा वाई- फाई प्रिंटर रखा था. उसने फोन से कमांड दी. घुर्रर्र. ज्ज्ज्ज्. प्रिंटर की वो यांत्रिक आवाज उस खामोश कमरे में गूँजी. कुछ ही सेकंड में, एक साफ, सफेद ए- फोर कागज बाहर निकल आया, जिस पर उस पेरिस वाले नोट की एक ब्लैक- एंड- व्हाइट छपी हुई थी. सावी ने उस नई कॉपी को उठाया और वो पेरिस वाला असली, मटमैला कागज वहीं टेबल पर छोड दिया. वो कॉपी लेकर बाथरूम की तरफ गई. बाथरूम में जाकर उसने सिंक के ऊपर वो कागज रखा. उसने शेल्फ से एक माचिस की डिब्बी निकाली. उसके हाथ बुरी तरह से काँप रहे थे. एक तीली निकाली और उसे डिब्बी पर रगडा. छर्र! एक छोटी सी, पीली- नीली लौ जल उठी. सावी ने उस लौ को उस सफेद कागज के किनारे पर लगा दिया. कागज ने आग पकड ली. वो जलने लगा. सावी उस जलते हुए कागज को देख रही थी. आग की वो लौ कागज के साथ- साथ मानो सावी के उस शक को भी भस्म कर रही थी. काले धुएँ की एक लकीर हवा में उठी और कागज राख में तब्दील होकर सिंक के सफेद बेसिन में गिर गया. सावी ने नल खोल दिया. पानी की धार ने उस काली राख को बहा दिया. सब कुछ नाली में बह गया. उसने एक बहुत ही गहरी, लंबी साँस ली. उसने अपनी आँखें बंद कीं और खुद को तसल्ली दी. खत्म. सब खत्म. वो सिर्फ एक वहम था. मैंने उसे जला दिया. अब कोई शक नहीं. अब कोई जाँच नहीं। वो एक आजाद इंसान की तरह बाथरूम से बाहर आई. उसने यह महसूस करने की कोशिश की कि उसने अपने दिमाग से वो' वायरस' निकाल फेंका है. लेकिन जब वो वापस बेडरूम में आई, तो उसकी नजर स्टडी टेबल पर गई. वहाँ, उस पुराने, जंग लगे टिन के डिब्बे के ठीक बगल में. पेरिस वाला वो असली, मटमैला कागज अभी भी रखा हुआ था. सुरक्षित. अछूता. सावी वहीं रुक गई. उसने कॉपी को जलाया था. उसने अपने शक की एक नकली परछाई को जलाया था. लेकिन असली सबूत. असली सच को जलाने की हिम्मत वो नहीं जुटा पाई थी. वो खुद से झूठ बोल रही थी. वो जानती थी कि उसने वो असली कागज सिर्फ इसलिए बचाया है क्योंकि उसके दिमाग के उस गहरे, खौफनाक कोने ने इस बात को स्वीकार कर लिया था कि मनीष पर जाँच करना जरूरी है. सावी ने बहुत ही भारी मन से वो असली कागज उठाया. उसने उस जंग लगे टिन के डिब्बे को खोला, जिसमें उसके बचपन की वो तीन- चार रहस्यमयी तस्वीरें रखी थीं. उसने वो कागज उन तस्वीरों के बिल्कुल नीचे छिपा दिया और डिब्बे का ढक्कन कसकर बंद कर दिया. डिब्बे का बंद होना इस बात का ऐलान था कि शक मरा नहीं था, वो बस सही वक्त का इंतजार करने के लिए तहखाने में छिप गया था. शाम के सात बज चुके थे. कमरे में अँधेरा घिरने लगा था. सावी अभी भी उसी डिब्बे को घूर रही थी. तभी, मुख्य दरवाजे का ताला खुलने की आवाज आई. क्लिक- क्लैक. मनीष घर आ गया था. सावी तुरंत अपनी जगह से उठी. उसने अपने चेहरे को अपने दोनों हाथों से थपथपाया, ताकि उसकी त्वचा में रंग लौट आए. उसने अपनी साडी ठीक की और एक बहुत ही सधी हुई, घरेलू मुस्कान अपने चेहरे पर ओढ ली. वो बेडरूम से बाहर हॉल में आई. मनीष ने अपना बैग सोफे पर रखा हुआ था. वो अपनी टाई ढीली कर रहा था. उसने सावी को आते हुए देखा. हाय सावी, मनीष ने मुस्कुराते हुए कहा. उसकी आवाज में दिन भर की वो आम सी थकान थी. लेकिन आज सावी उसे उस तरह से नहीं देख पा रही थी जैसे वो हमेशा देखती थी. आज जब मनीष मुस्कुराया, तो सावी की नजरें उसकी आँखों की गहराई नाप रही थीं. जब मनीष ने अपनी टाई उतारी, तो सावी की नजरें उसकी कलाई के मूवमेंट पर थीं. वो हर चीज का विश्लेषण कर रही थी. मनीष ने रसोई की तरफ जाते हुए गैस पर चाय का पानी चढाया. आज तो चाय मैं ही बनाऊँगा. बहुत सिर दर्द है दफ्तर के काम से। सावी डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर चुपचाप बैठ गई. मनीष ने चाय में अदरक कूटी और फिर मुडकर सावी की तरफ देखा. उसकी आँखें जो हमेशा बहुत भोली लगती थीं, इस वक्त सावी के चेहरे पर बहुत ही गहराई से गडी थीं. मनीष की वो निगाह. वो एक पति की निगाह नहीं थी. वो एक ऐसी निगाह थी जो सामने वाले के चेहरे के पीछे छिपे हुए भावों को स्कैन कर रही थी. कुछ परेशान लग रही हो? मनीष ने बहुत ही साधारण, कैजुअल तरीके से पूछा. लेकिन उसकी आवाज में एक अजीब सा ठहराव था. सावी के सीने में एक बर्फीली सिहरन दौड गई. क्या मनीष ने उसकी घबराहट को पढ लिया था? क्या वो उसका' बेसलाइन टेस्ट' कर रहा था? सावी के पास सच बोलने का विकल्प नहीं था. अगर वो सच बोलती, तो यह घर उसी पल किसी युद्ध के मैदान में बदल जाता. उसे अपने पति से नहीं, बल्कि अपने सबसे बडे संदिग्ध से बात करनी थी. सावी ने अपनी आँखों में एक बहुत ही प्राकृतिक सी थकान लाई. उसने अपने होंठों को एक फीकी सी मुस्कान दी. नहीं. बस थोडी सी थकान है, सावी ने बहुत ही सहजता से कहा. आज पूरे घर की सफाई जो की है. कुछ नहीं, चाय पिऊँगी तो ठीक हो जाऊँगी। यह सावी शर्मा का मनीष शर्मा से बोला गया पहला जानबूझकर, सोची- समझी साजिश के तहत बोला गया झूठ था. मनीष ने उसे कुछ पल और देखा. फिर वो मुस्कुराया. तुम भी ना, जान निकाल लेती हो काम में. बैठो, मैं कडक चाय लाता हूँ। मनीष वापस गैस की तरफ मुड गया. सावी अपनी जगह पर बैठी रही. उसका दिल इतनी जोर से धडक रहा था कि उसे डर था कहीं मनीष उसे सुन न ले. उसने अपने ही पति से झूठ बोला था. जाँच आधिकारिक तौर पर शुरू हो चुकी थी. कोई फाइल नहीं बनी थी, कोई टीम नहीं थी, लेकिन एक पत्नी ने अपने पति के खिलाफ शक की उस अँधेरी सुरंग में पहला खौफनाक कदम रख दिया था. अब यहाँ से लौटने का कोई रास्ता नहीं था. सावी, जो अब तक बाहरी दुश्मनों से लडती थी, अब अपने ही घर के अंदर एक' अंडरकवर' पत्नी की तरह कैसे काम करेगी? मनीष की दिनचर्या का वो कौन सा हिस्सा होगा जो सावी की इस खामोश जाँच में सबसे पहला सुराग बनकर उभरेगा? क्या मनीष सावी के इस झूठ को पकड चुका है, और क्या वो भी अपनी पत्नी के खिलाफ कोई जवाबी चाल चलने वाला है?

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